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Friday, 26 January 2018

जिंदगी की पहली सिख

जिंदगी की पहली सिख : जिंदगी की पहली सिख जो मुझे मिली थी ४थ स्टैण्डर्ड में। नमस्कार दोस्तों मेरा नाम उत्पल काफ्ले है। में आज आपलोगो से एक सच्ची मेरी जीबन की ही एक कहानी बताने जा रहा हु। वैसे आपलोगो के पास व् बहुत सरे ऐसी सिख मिलने वाली कहानिया मैंने नेट पे पड़ा है जो हमे वाकई में मोटीवेट कर देती है.


में तब ९ साल का था। जब में ४थ में पड़ता था। एक दिन मैंने मेरा स्कूल ले जाने वाला बोरी जो की हम स्कूविचाके पढ़ाई किया करते थे। उसको गुम कर दिया। में रोज की तरह ही खेलते खेलते स्कूल से घर जाने लगा। स्कूल से घर की दूरी लगवग १ से २ किलोमीटर क बीच में रहेगी. मैंने मेरे एक दोस्त के  घर में अपना किताब  और बोरी रख  उनके साथ खेलने चला गया। लेखिन बात तो तब बड गयी जब में खेलके वापस आया तो मेरी बोरी जो की वाइट कलर की थी  वो मेरे किताब क साथ नहीं था। मतलब  मेरी बोरी किसीने चोरी कर ली थी।
अब मुझे घर जाना था क्युकी सुबह में घर से जो खा के आया था वो पेट में खत्तम हो गया था यानी मुझे भूख लग रही थी। लेकिन मुझे डर लगने लगा की में बिना मेरी वाइट बोरी लेके बिना ही घर  आया तो मुझे मेरी माँ डाँटेगी।


में मेरी माँके डर से घर जाने से पहले सोचने लगा की अब माँ को क्या मुँह दिखाऊँगा। तभी मेरी दिमाग में एक आईडिया आया और में अपने माँ क माइका जो की पास में ही था में वह चला गया। वाह जातेहि मुझे दादाजी ने पुकारा अरे छोटु तू स्कुल से आह गया। चल आजा मेरे पास। में दादाजी पास गया और अन्दर से नानी की आवाज आया की अरे छोटु आजा कुछ खाले।
लेकिन मैंने खाना खाने को माना कर दिया। क्युकी मुझे पता था की में दादाजी के  घर खाना खा के गया तो मेरा घर का खाना ज्यादा  हो जायेगा और मेरी माँ मुझे गुस्सा करेगी।
मुझे दादाजी के घर से बोरी चुराने का था। तो में उनके आँख में धूल डालके घर क अंदर चला गया। मैंने अंदर देखा तो किचन क पास एक YELLOW COLOUR का बोरी पडा हुआ था।  मैंने चुपके से उस बोरी को उठा ली और अपनी घर क तरफ निकल पड़ा। 


घर जाते ही मैंने माँ को आवाज लगाया। माँ माँ आप कहा हो ? तो माँने अंदर से आवाज लगाया हा  बेटा आप आ गये। मेरा अच्छा बेटा  स्कूल से आह गया। भूक लगी है। चल हाथ मुँह धोले में खाना परोस देती हु। 
माँ ने जैसा कहा मैंने बहार नल के पास जाके अपने मुँह हाथ धो  लिए और खाना खाने क लिए बैठ गया। . 
में खाना खा रहा था तवी बहार से किसी की आवाज आयी। मैंने सुना कोई मेरी माँ का नाम लेके उनको पुकार रहा था। माँ बहार गयी तो उधर से मेरी दादी आह रही थी। दादी ने पहोचतेहि  मैंने उनके घर से एक बोरी चुरा क लाया बोलके मेरी माँ को बताया। 

मेरी माँ गुस्से से लाल हो गयी। में खाना खा के  खत्तम वि  नहीं किया था तवी मेरी माँ ने मुझे पूछा क्या भाई तूने दादजी के घर से बोरी लेके आया ? 
में क्या बोलता चुप चाप निचे मुँह कर के बैठा रहा। माँ ने तीन बार पूछा लेकिन मेरे पास कोई जवाब नहीं था। 


मेरी माँ मेरे ऊपर बहुत गुस्सा हो गयी और मेरी हाथ में पकड़ के मुझे बहार ले गयी। बहार हमारे गाय बांधने  वाली जगह पे मुझे एक खम्बा पे दोनो हाथ पीछे कर के बांध दी। 
माँ ने मुझे बार बार बोल रही थी की तूने चोरी की मेरी नाक काट दी।

जिंदगी की पहली सिख


तवी पास में पिताजी की हल जोतने वाली लट्टी लेके मुझे मारने  लगी। में रोने लगा। 
वो जितनी बार मुझे लाठी से मारती उतनी बार पूछ रही थी की अब चोरी करेगा या नहीं। 
में रो रो के बोल रहा था की आज के बाद में ऐसा नहीं करूँगा। 
पिट पिट क माँ थक गई। में रो रहा था। पास में दादी बोल रही थी की छोड़ दे इसे लेकिन तब तक माँ नहीं मानी  और अंदर जाके कपडे सिलने वाला सुई लेके आई। 

मेरे पीछे बंधा हुवा हाथ पकड़ क मेरे दुनू हाथ के  ऊँगली को छेद करने लगी. छेद करते बक्त बार बार बोल रही थी आज से चोरी करेगा। में रो रो के जवाब दे रहा था की आज से ऐसा नहीं करूँगा। 
मेरी ऊँगली से खून निकल रहा था तवी उसका गुस्सा थोड़ा काम हुवा तो मुझे खम्बे से खोल दिया गया।

मुझे थोड़ी रहत मिली. में कमसे कम १५ दिन तक लिख नहीं पाया.
तब से आज तक मैंने कवी दूसरे की चीज़ को आँख उठके नहीं देखा है.